Saturday, September 27, 2014

शिक्षक दिवस - 2014


जब कभी हम किसी शिक्षक को याद करते हैं - तब संभवतः हमें हाई स्कूल के शिक्षक ही याद आते है - इसका एक कारण है - हमारे जीवन में वह एक ऐसा दौर होता है जो हमारे व्यक्तित्व निर्माण का अहम् हिस्सा होता है - ज्ञान से लेकर शिक्षक के हाव भाव सभी पर हम गौर फरमाते हैं और वो अमीट छाप आजीवन रहता है ! 
सातवीं कक्षा में पहली दफा हाई स्कूल गया - जिला स्कूल मुजफ्फरपुर - प्रिंसिपल थे - डा० जयदेव झा - खूब लम्बे और मेरे पिता जी के भी शिक्षक रह चुके थे - मेरे समय में प्रिंसिपल बन गए - वो एक ऐसी छवी थे - जिनसे उस दौर में पूरा मुजफ्फरपुर थर्राता था और वो मुझसे बेहद मधुर भाव से मिलते थे - खूब हंसते और कहते - बाप बेटा दोनों मेरे चेला ...:)) 
फिर अगले साल पटना आ गया - सर गणेश दत्त द्वारा स्थापित स्कूल में - गजब का स्कूल था - गवर्नर का बेटा भी उसी बेंच पर और गवर्नर के धोबी का बेटा भी उसी बेंच पर - शहर के मशहूर सर्जन का बेटा भी उसी स्कूल में और गली में खैनी का दूकान चलाने वाला का भी बेटा उसी स्कूल में ...:)) और स्कूल का मतलब भी यही होता है - जहाँ जाकर आप सभी उंच नीच / गरीब अमीर ..सब कुछ भूल जाएँ ...:)) 
वहीँ उसी स्कूल में होते थे - पुरे पटना के मशहूर साईंस शिक्षक "डी डी राय" ...छः फीट लम्बे ...भक भक गोरा रंग ...भारी भरकम शरीर ...मुह में पान ...और केमिस्ट्री लैब में अकेले चुप चाप बैठे ...पुरे स्कूल के शान ...ठसक किसी भी इंसान से कम नहीं ....खुला जीप ...:)) पर स्कूल पैदल ही आते थे ....एकदम गंभीर व्यक्तित्व ...कोई राजनीति नहीं ...स्कूल के हर एक विद्यार्थी के दिल में समाये ...कहते हैं ...उनके गंभीर व्यक्तित्व को लेकर कई कहानीयां थी ...मै हर घंटी के बाद ...उनके लैब के सामने से गुजरता था ...एक झलक देखने को ...ये कैसे टीचर हैं ...जो पुरे स्कूल की धड़कन हैं ...
नौवीं कक्षा में पढ़ाने आये ..."क्या जी ..लड़का " - फेमस डायलोग ...कोई थोड़ा भी हीरो बना ...'चुरकी' पकड़ ....तौबा तौबा ...जीवन में वैसी पिटाई नहीं देखा ....आज उनसे पीटे हुए अलुम्नी बड़े गर्व से कहते हैं ...सर का आशीर्वाद ..हा हा हा हा ...
दसमी में वो हमारे क्लास शिक्षक बने ....और कुछ महीने बाद ...उनको गले का कैंसर हो गया ....जीवन में पहली दफा ...अपने किसी आईडियल को कैसर से मरते देखा था ...ज्ञान का पता नहीं ...पर उनका व्यक्तित्व बहुत प्रभावित किया था ....
आज इतने साल बाद ....अपने स्कूल में ...उनकी स्मृती में ...नौवीं कक्षा के बेहतरीन साईंस स्टूडेंट को ...उनके नाम से पुरस्कृत करते हुए ..आँखें भर आयी ...भाव में बहुत अच्छी अच्छी बातें कह गया ...उनके मृत्यु के कई साल बाद पैदा हुए ...वैसे विद्यार्थी ....के हाथ में उनके नाम का मेडल ....सर की आत्मा जरुर खुश हुई होगी ....ना खून का रिश्ता ...ना ही मै कोई उनका प्रिय शिष्य ....बस एक व्यक्तित्व का आकर्षण था ....और उसको ज़िंदा रखने की कोशिश भर ....:)) 
अजब है ये ज़िंदगी ....कहाँ ..कैसे और किस रूप में ...आप किसकी स्मृती में ज़िंदा है ....कहना मुश्किल है ....!!! 
"आज बढ़िया भाषण दिया " ....अपने स्कूल में ....अपने प्रिय शिक्षक की याद में ....इससे बढ़िया शिक्षक दिवस क्या हो सकता है ....:)) 
मन खुश है ....खूब खुश ....:)) थैंक्स अलुम्नी और मेरे मित्र गौरव ....:))
@RR

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